अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर ट्रेड टैरिफ बढ़ाकर 18 प्रतिशत किए जाने के फैसले के पीछे भारत का राष्ट्रीय हितों से समझौता न करने का सख्त रुख अहम वजह माना जा रहा है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वर्ष सितंबर में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के लिए स्पष्ट संदेश लेकर वॉशिंगटन पहुंचे थे। इस दौरान डोभाल ने रूबियो से साफ कहा था कि भारत राष्ट्रपति ट्रंप और उनके शीर्ष सहयोगियों की धमकियों के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि भारत पहले भी प्रतिकूल अमेरिकी प्रशासन का सामना कर चुका है और दबाव में आने के बजाय मौजूदा राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने तक इंतजार करने को तैयार है।
रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात के बाद अमेरिका के साथ रिश्तों को सामान्य करने के प्रयासों के तहत डोभाल को अमेरिका भेजा था। इसी दौरे के दौरान डोभाल और रूबियो के बीच अहम बातचीत हुई। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, डोभाल ने कहा था कि भारत धैर्य रख सकता है, लेकिन वह यह भी चाहता है कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनके सहयोगी सार्वजनिक मंचों पर भारत के खिलाफ बयानबाजी से बचें, ताकि द्विपक्षीय संबंधों में सुधार हो सके।
इस बैठक के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम होने के संकेत भी सामने आए। 16 सितंबर को राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन कर उनके कार्यों की सराहना की। इसके बाद साल के अंत तक दोनों नेताओं के बीच टैरिफ कम करने की संभावनाओं को लेकर चार बार फोन पर बातचीत हुई। हालांकि, सार्वजनिक रूप से किसी समझौते की घोषणा नहीं की गई थी। ऐसे में सोमवार को ट्रंप द्वारा सोशल मीडिया पर ट्रेड डील से जुड़ी पोस्ट साझा किए जाने से कई भारतीय अधिकारी हैरान रह गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि डोभाल-रूबियो बैठक ने अमेरिका को यह संकेत दिया कि भारत उसे दीर्घकालिक साझेदार मानता है और रिश्तों को और बिगड़ने नहीं देना चाहता।
भारत में यह आम धारणा रही है कि चीन को संतुलित करने और वर्ष 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के प्रधानमंत्री मोदी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमेरिकी पूंजी, तकनीक और सैन्य सहयोग अहम है। दिसंबर में भारत में नए अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के आगमन को भी संबंध सुधारने की दिशा में एक बड़ा संकेत माना गया। गोर व्हाइट हाउस के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं और राष्ट्रपति ट्रंप तथा विदेश मंत्री रूबियो के करीबी माने जाते हैं। अपने पहले सार्वजनिक संबोधन में उन्होंने भारत-अमेरिका तनाव को “असली दोस्तों के बीच असहमति” करार दिया था।
हालांकि, रिश्तों में सुधार के संकेतों के बावजूद भारत ट्रंप प्रशासन के साथ सतर्क रुख अपनाए हुए है, क्योंकि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी की रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ हाथ पकड़कर मुस्कुराते हुए वायरल हुई तस्वीर भी इस बात का संकेत थी कि भारत के पास वैकल्पिक रणनीतिक विकल्प मौजूद हैं। दिसंबर में पुतिन के भारत दौरे पर हुए भव्य स्वागत को भी इसी संदेश से जोड़ा जा रहा है।
इसी बीच भारत ने हाल ही में करीब दो दशकों की बातचीत के बाद यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया है, जो ब्रिटेन के साथ हुए व्यापार समझौते के कुछ महीनों बाद सामने आया। इन घटनाक्रमों से साफ है कि अमेरिका के साथ अस्थायी अड़चनों के बावजूद भारत अपने व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों में विविधता लाने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रहा है। इसी कड़ी में इस महीने के अंत में प्रधानमंत्री मोदी कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा की मेजबानी भी करेंगे।